Monday, November 26, 2012

लहरों पर सवार अनुभूतियाँ


मुझे न जाने कितनी बार ही यह अनुभूति होती हैं कि खुशियों और समुद्री लहरों में आपस में कुछ समानताएँ होती हैं ,उदाहरणार्थ खुशियाँ भी लहरों के तरह  उफनती हुई आती हैं और हमारे मन और मस्तिष्क को अपनी शीतल अनुभूतियों से सरोबर कर देती हैं ,आती हुई लहरे ज्यादा  रोमांचित करती हैं बनिस्बत इसके कि जब लहर हमसे टकराए और हम उसकी तीव्रता कम होती हुई महसूस करें , खुशी भी जब आती हुई मालूम होती हैं तो ज्यादा अच्छा लगता हैं बनिस्बत खुशी को भोगते हुए इतना रोमाचं नहीं होता

उपरोक्त विचार मेरे मन में उमड़ घुमड़ के आ रहे थे जब भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिमी घाट पर उत्तर मध्य कोंकण पट्टी का भ्रमण कर रहा था | परशुराम की इस धरती पर पहाड़ ,समुद्र और मैदानों का अद्भुत मिश्रण नज़र आता हैं | एक तरफ  आकाश का चुम्बन लेती सह्याद्री पर्वत की चोटियाँ तो दूसरी तरफ  हिलोरे मारता अरब सागर  और इन दोनों के बीच बसे हुए अनगिनत मंदिर और छोटे छोटे सुरम्य गाँव-कस्बे |



सहयाद्री की चोटियों पर रेंगते बादल और धुंध मुझे जीवन के अबूझ रहस्यों जैसे दिखाई दिए, जिन्हें हम देख तो सकते हैं पर उनका उदगम नहीं जान सकते जैसे धुंध हमारी अज्ञानता को प्रकट कर रही हो जो हमारे पहाड़ रूपी उबड़ खाबड़  जीवन पर छाई हुई है , बादल जैसी महत्वाकांक्षाए जिन्हें हम सैदेव ऊपर की बढते देखते रहते हैं  |


पहाडो के मध्य राजमार्ग सर्पीली आकृति में ढला हुआ एक रोमांचकारी अनुभूति देता हैं जिस पर सफर करना जीवन में लिए गए ऐसे निर्णयों के प्रतिबिंबित करता हैं जिनके परिणाम के बारे में हमें ज्यादा अंदाज़ा नहीं होता.

हरे भरे पेड़ जिनमे नारियल,हापुस और केले बहुतायत में है,तीनो पेड़ एक साथ हमारी भारतीय संस्कृति के तीन आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं | नारियल हमारी हजारो वर्ष पुरानी आध्यात्मिकता का, केले हमारी मानसिक सरलता और हापुस हमारी संस्कृति की उस शक्ति का प्रतीक हैं जो विभिन्न मतों और दर्शनों को
अपने आप  में समाहित और पुनर्नियोजित कर लेती हैं |

कोंकण पट्टी के पूर्व में सह्याद्री है तो पश्चिम में अरब सागर ,ये दोनों परम भोगोलिक स्थितियां हैं जो मेरे लिए जीवन की भव्यता और तरलता का प्रतिनिधित्व करती हैं ,जीवन की भव्यता का तात्पर्य केवल भौतिक उन्नति की प्राप्ति नहीं हैं जीवन के भव्यता निहित हैं इसमें भोगे जाने वाले विभिन्न यथार्थों में, जैसे पहाड़ पर कही घने पेड़ है तो कही झाड़ झंखाड और कही तो नग्न चट्टानें , ये सभी मिलकर पहाड़ को पूर्ण भव्यता प्रदान करते हैं ,ठीक इसी प्रकार सुख-दुःख, सफलता-असफलता ,मान-अपमान आदि मिलकर जीवन को भव्यता प्रदान करते हैं |

 ठीक इसी प्रकार अगर जीवन समुद्र की तरह तरल नहीं होगा यानी वो विभिन् स्थितयों में ढलने के योग्य नहीं होगा तो जीवन की यात्रा लगभग असंभव हैं
क्योंकि तरल ठोस की अपेक्षा ज्यादा तेज़ी से अपनी मंजिल तय करता हैं |

कोंकण के समुद्र तट धार्मिकता और सैर-सपाटे का अद्भुत मिश्रण हैं , किनारे पर प्राचीन मंदिरों में दर्शन कीजिये और मंदिर के पीछे या सामने फैले हुए समुद्र तट पर जाकर लहरों में डुबकी लगाइए या लंबे रेतीले तट पर चलते हुए लहरों से अपना पद प्रक्षालन करवाइए |

कोंकण के समुद्र तटों मंदिर होने से एक बात तो सुनिश्चित हो जाती है कि समुद्र तट "BEACH" नहीं बन पाते जो अच्छा भी और उदासी भरा भी....अच्छा इसलिए कि हरेक आदमी कूड़ा करकट
करने से पहले १० बार सोचता हैं और उदासी भरा इसलिए कि भई "Beach"वाला मज़ा न ले पाने के कारण अधूरापन महसूस होता हैं |

Saturday, November 10, 2012

प्रियतमा



प्रिये तुम कितनी कोमल कितनी चंचल
आवाज़ तुम्हारी
कितनी सुरमई
देती मुझे प्रेरणा और हिम्मत हर पल

समीप रहती तुम सदैव मेरे मन के
छवि अमिट है तुम्हारी,
ह्रदय में मेरे
नहीं भूल सकता तुम्हे चाह कर के

वो क्षण, जब तुम रहती हो मेरे आसपास
सुंगंध तुम्हारे,
काले टेसुओं की
अविस्मृत कर देती मुझे तुम्हारी हर श्वास

प्रभावित होता हूँ मैं तुम्हारे व्यक्तित्व से
लगता हैं मानो
तुम हो साक्षात रति
आह्लादित होता मैं तुम्हारे  लावण्य से

अपनी मोहक मुद्राओं से मदांध करती
बल खाती तुम्हारे
कटी बंध की रेखाएं
श्यामवर्णी लटें बलखाती आँचल पर लहराती

नयनो में छलकता विराट प्रेमसागर
पानी जिसका
जैसे हो कोई मदिरा
पाया प्रेम रत्न मैंने इसमे डूबकर

अभिलाषा मेरी हैं केवल इतनी प्रिये
अमिट रहे छवि तुम्हारी
ह्रदय में
आती रहन स्वप्न में इसलिए

अंग्रेजी चिठ्ठे


Finding happiness in your life 

Excellent Articles

Friday, November 9, 2012

अचानक से


मुझे ईश्वर का वरदान हैं मेरे पिता,/मेरे लिए धूप में छावं है मेरे पिता,
मेरे वजूद का नाम है मेरे पिता,/मेरी धड़कन मेरी जान हैं मेरे पिता,........

लेखक  और कवि अंकुर जी का ब्लॉग
http://www.writerankur.in/2012/11/blog-post_9.html?spref=tw

भारतीय दर्शन ,साहित्य एवं अध्यात्म और धर्म के ठेकेदार

Eroticism & Spirituality 


विगत दिनों एक बेहद फूहड़ किस्म की फिल्म सिनेमाग्रहों में अवतरित हुई हैं , जिसका नाम "स्टूडेंट ऑफ़ इयर " (Student of Year) हैं, इस फिल्म के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका हैं अत इसके बारे और लिखना इस लेख के लिए उपुक्त विषय वस्तु  नहीं हैं | 

इस लेख का उद्देश्य उस विवाद पर अपना पक्ष रखना हैं जो इस फिल्म के एक गाने में "राधा" शब्द और राधा को लेकर गाने की पंक्तियों  पर मचा हुआ बेतुका विवाद हैं | 

धर्म और नैतिकता के तथा कथित ठेकेदार जो ऐसे ही मौकों की तलाश में  रहते हैं एक बार फिर "धर्म" और "आस्था" के रक्षा के लिए  कमर कस के मैदान में आ डटें हैं ,जिन्हें न तो भारतीय संस्कृति ,साहित्य और दर्शन  का रत्ती भर ज्ञान हैं और न ही उस परम्परा और अभिव्यक्ति का जो हमारी संस्कृति का अंग रही हैं .

बुद्धि रहित भक्ति और अनियंत्रित कामुकता का हमारे भारतीय साहित्य  और दर्शन चिंतन में सदैव निषेध 
रहा हैं ,तभी तो वैष्णवो के भावुकता पूर्ण भक्ति को  शैव मत चुनोती देता प्रतीत होता हैं ,तो शैवों के अनियंत्रित भोग और तांत्रिक परम्परा के मांस मैथुन मदिरा के दर्शन को जैनमत और बौद्धमत चुनौती देते नज़र आते हैं |
१२ शताब्दी :गणेश और देवी ..रतिक्रिया रत(See the hand of lord Ganesh )



यहाँ पर मैं तथागत भगवान बुद्ध के उस उपदेश देने की इच्छा को रोक नहीं पा रहा हूं जो इन खोखले और भ्रमिष्ठ  ठेकेदारों के मुहँ पर करार तमाचा हैं जो हर वक्त "धर्म खतरे" में का विलाप करते  रहते हैं 

मूल मागधी में 


"कुल्लुपम वो भिख्खे धम्मं देस्सिसामी
 नित्करगाम  वो गृहणत्याय |
 धम्मपि  पहातथापवेगव अधग्मा"

अर्थ:-

"भिक्षुओं ,मैं नौका की तरह धर्म का उपयोग करता हूँ | यह पार होने के लिए है ,पकड़ कर बैठने के लिए नहीं हैं |
जिसे हमने अधर्म मान  लिया हैं , उसे तो छोड़ देना ही पड़ता है , किन्तु जिसे हमने धर्म भी मान रखा था , और कालांतर में हमें लगता है की वह धर्म भी अब त्याज्य हैं , तो उसे भी छोड़ देना चाहिए "

आजकल के "धार्मिक कोलाहल" में हम धर्म को पकडे बैठे हैं ,पार होना तो असम्भव हैं 


कहने का तात्पर्य यह है की हमारी भारतीय संस्कृति में ,भारतीय साहित्य परम्परा में, काम और आध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू रहे हैं ,तांत्रिक परम्परा में तो देवी के सामने सम्भोग पूजा का अंग ही था ,शंकराचार्य की रचना "सौन्दर्यलहरी" पढ़े तो मालूम होगा की देवी के होटों से लेकर जंघा तक की स्तुति की गई हैं  देवी की स्तुति हो या फिर रीतिकाल में घनानंद ,जयदेव और बिहारी जैसे धुरंधर कवियों द्वारा रचे गए अनगिनत पद और पदावलियाँ जिनमें  राधा और कृष्ण के प्रतीकों को लेकर सम्भोग,रतिक्रिया और अध्यात्म के विभिन्न आयामों को अपने पदों में स्थान दिया हैं |
गजलक्ष्मी 


सबसे बड़ा उदहारण जो हमारे सामने रोज ही अपने नग्न रूप में  रहता हैं  वो हैं शिवलिंग ,यह क्या है ? और किसका प्रतीक हैं ? क्या देवी पार्वती की योनी, पिंडी का निचला भाग प्रदर्शित नहीं करता ,इसमें स्थित शिवलिंग जीवन के उद्भव और प्रकृति  की रचनाशीलता को नहीं दिखाता
श्री राम और देवी सीता: Artistic Representation 


अब कुछ पदों के द्वारा  "राधा" के शोर शराबे पर मचे बेतुके विवाद पर रौशनी डालूँगा 

बिहारी कृत बिहारी सतसई में राधा और कृष्ण के केवल प्रेम का ही उल्लेख नहीं बल्कि राधा किस रीति से कृष्ण के साथ रतिक्रिया करती हैं और कृष्ण राधा के तन पर पर कौनसे निशान बनाते हैं  इनका बड़ा मनोहारी और काव्यात्मक वर्णन हैं | बेशक कामुक हैं परन्तु कहीं से भी अश्लील और भोंडा नहीं हैं 

 राधा हरि ,हरि राधिका,बनी आई संकेता ; 
    दमपति रति बिपरति सुख,सहज सूरतहुम लेत 

अर्थ: 
राधा हरि ,हरि राधिका  अर्थात कृष्ण और राधा ने अपनी भूमिका बदल ली है ,रतिक्रिया में राधा कृष्ण के  ऊपर हैं (reverse missionary position) ,इस तरह राधा को कृष्ण होने का अहसास हुआ और उसे अभिनव आनंद की प्राप्ति हुई ,जबकि रति क्रिया सामान्य ही थी |

 पट की धीग कट धाम पियती  सोभित सुभग सुभेसा 
  हड़ रड़चढा  छबि देत रहा,सदा रड़ा की रेख 

कृष्ण राधा को छेड़ते हुए कहते हैं 
काटने के निशान तेरे  होटों पर दिखाई दे रहें हैं ,ओ मोहिनी प्यारी क्यों उन्हें छुपा रही हो अपनी साड़ी के पल्लू से 

कही पथाई मन भवति ,पिया आवन की बात 
  फूली अंगना में फिरई ,अंग न अंगई समात 

पिया के आने की खुशी में  ,अपने आँगन में वह खुशी से नाच रही है उसके वक्ष(Breast) प्रसन्नता से इतने फूल गए हैं कि उसकी अंगिया  उन्हें संभालने में असमर्थ हैं 

देव भाषा संस्कृत के नाटक कर्पूरमंजरी जिसे ,संस्कृत विद्वान लेखक राजशेखर ने लिखा था ,में ११ शताब्दीमें शैव मत  और कौलाचार , व्यहवार और आचरण और दर्शन की अद्भुत जानकारी मिलती हैं  

इसमे शैव कौलाचारी तांत्रिक  अन्य संप्रदायों के  आडम्बर की  खिल्ली उडाता हुआ कौलाचार को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताता हैं 
(मूल प्राकृत भाषा में )

मंतो ण तांतो ण अकिं पी जाणे
झमणाम  च ण किम पी गुरुप्रसाद 
मज्जम पीवामो ,महिलाम रमामो
मोख्ख्म च जामो कुल माग्गलग्गा 

अर्थ: मैं कोई रीति रिवाज या मंत्र नहीं मानता ,न मेरा ध्यान में विश्वास हैं, मेरे गुरु की आज्ञा से मैं मदिरा पान करूँगा  और स्त्री के साथ सम्भोग करते हुए  मोक्ष प्राप्त करूँगा  यही कौलाचार हैं 

भैरवानन्द कौलाचार को और स्पष्ट करते हुए कहता हैं 

भुक्षीम भाणती हरिबमहा मुह-वी देवा 
झणेणा  विपाधेणा  क दुक्कीआहिम 
एकेन्ना केवलं उमा दाई देण  दीणनों 
मोख्खे समय सूरा केली सूरा रसेहीम 
उमा महेश्वर: Flamboyant couple 


अर्थ:  "हरि और ब्रह्मा कहते हैं कि मोक्ष ध्यान से प्राप्त होगा ,वेदों का ध्यान और रीतिया (कर्मकांड) करनी पड़ेंगी केवल "उमा" के पति (शिव) ही ऐसे अकेले देव हैं जो कहते हैं कि मोक्ष केवल सम्भोग और मदिरा पान से मिलेगा 


उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि काम और अध्यात्म किस तरह एक दूसरे से हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं |





Wednesday, November 7, 2012

-:मदिरा :-


                     
 मदिरा वह द्रव है जो दवा होने का दवा करने के साथ साथ  सीधे अवचेतन याने Subconsciousness
पर आघात करती हैं | यह उस विश्व के होने का अति विश्वसनीय आभास देती हैं जो हमारे मस्तिष्क के रचनात्मक क्रियाशीलता का भाग नहीं होता ,इसी अवस्था को नशा या मद नाम से भी परिभाषित किया जा सकता हैं |  मदिरा पीने के पहले की स्थिति और फिर पीने के बाद की स्थितियों के अनुभवों को जैसा अनुभव किया उन्हें शब्दों के वस्त्रों में लपटने का प्रयास है यह कविता 


मद है जिसमे अटूट और जहरीला 
पीता इसको है फिर भी हटीला 
पीकर मनुष्य जिसको नहीं होता अकेला 
इस द्रव को कहते हम मदिरा 

दुःख ,पीड़ा को हरती और देती चैन 
पीकर इसको दमकते दोनों नैन 
व्यसनी मानते इसको अनमोल हीरा 
इस द्रव को हम कहते मदिरा  

जाम पे जाम पीते और छलकाते
मनुष्य अपनी बैचैनी भूल जाते 
लगता सरल पथ यदि हो पथरीला 
इस द्रव को हम कहते मदिरा   

अधरों की प्यास बुझती हैं 
कंठ को तर कर देती हैं
मस्तिष्क पर तो असर होता गहरा 
इस द्रव को हम कहते मदिरा  

प्रेमिका बन अधरों का चुम्बन लेती 
माता बन सिर को थपकाती
मित्र बन साथ हमारे लहराती 
इस द्रव को हम कहते मदिरा   

पीकर इसको बनता कोई दार्शनिक 
होता ये है मात्र  तात्क्षणिक 
उतरती है तो होता सब नाकारा
इस द्रव को हम कहते मदिरा  

Tuesday, October 30, 2012

अंग्रेजी चिट्ठों से

Did I fly too high?
Sun blazes angrily
Wax weeps from my wings.......


वस्तुतः कविता न होकर एक प्रकार से सवेंदना स्वयं शब्द बनकर प्रस्तुत हैं 
http://followyourshadow.wordpress.com/

  "एक सच्चा मुसलमान " कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ में होती है जिस के लेखक बारे में कल तक आप को कुछ भी  कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ...