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Saturday, March 23, 2013

प्रेमचंद के निधन पर प्रकाशित दुर्लभ कविता:लेखक श्री गौरीशंकर मिश्र "द्विजेन्द्र"


प्रेमचंद 


प्रेमचंद तुम छिपे!किन्तु यह नहीं समझा था 
प्रेमसूर्य  का अभी कहाँ हुआ उदय था 
उपन्यास और कथा जगत तमपूर्ण निरुत्तर 
दीप्यमान था अभी तुम्हारा ही कर पाकर 

अस्त हुए रूम ,वृत यहाँ छा गया अँधेरा 
लिया आंधी ने डाल तिमर में आन डेरा 
उपन्यास है सिसकता रहा,रो रही कहानी 
देख रहे यह वदन मोड़ कैसे तुममानी 

सोचो उससे रुठ भागना अभी कथित है 
जिसमे आत्मा प्राण देह सर्वस्व निवर्त हैं 
क्या क्या इसके हेतु तुमने है वारे?
गल्प तुम्हारा और तुम गल्प के हो प्यारे 

हिंदू-उर्दू बहन बहन को गले मिलाया 
आपस कर चिर बैर-भाव को मार भगाया 
रोती  हिंदी इधर,उधर उर्दू बिलखती 
भला आज क्यों तुम्हे नहो करुणा आती 

छोड़ सभी को क्षीण दीन तुम स्वर्ग सिधारे 
रोका नहीं हा ! सके  तुम्हे शुचि प्रेम हमारे
आज नहीं तुम!किन्रू तुम्हारी कहानी 
सदा रहेगी जगत बीच  बन अमिट निशानी 



Friday, December 7, 2012

सर्दियों का एक स्वप्न

आज एक अंग्रेजी पत्रिका में मुझे फ़्रांसिसी कवि ऑर्थर रिम्बौद (Arthur Rimbaud) कि एक सुन्दर कविता "अ ड्रीम फॉर विंटर" पढने को मिली. यह कविता एक सुन्दर अनुभूति है और भाव प्रवण भी .एकाएक  मन में ख्याल आया कि इसका हिंदी भावार्थ कर के देखना चाहिए बस फिर क्या था ...















सर्दियों में जब हम निकल पड़ेंगे 
यात्रा करने  रेल के नीले डिब्बे में
जिसमे होंगे सफ़ेद तकिये ,
निश्चिन्त और आरामदायक 
जिसके हर मुलायम कोनों पर होंगे
चुम्बनों के अम्बार बिखरे हुए 

तुम अपनी आँखे बंद कर लोगी 
जिससे तुम खिडकी के बहार 
नहीं देख पाओगी,
सांझ की उतरती परछाइयाँ,
वो रिरियाती भीड़ भाड़,या 
धूर्त भेडिये या काले कुत्ते 

अब तुम महसूस करोगी 
तुम्हारे गालों पर खरोंचे 
इक मखमली चुम्बन मानो,
एक मतवाली मकड़ी 
तुम्हारी गर्दन पर फिसल गई हो 

और तुम मुझसे कहोगी 
अपना सिर पीछे झुकाकर
"ढूंढो उसे "
और मै उस जीव को ढूढने में 
एक लंबा समय लगाऊंगा 
जो इधर उधर बहुत भागता है 

Thursday, December 6, 2012

Around the Sea & Across the Mountain


When I enter in the Konkan
Across the mighty Sahyadri
My mind was fully awaken

Mind exploring heights of Sahyadri
Thinking of famous Maratha Bravery
Soul floating on blue wave
Body loosing whole race.

When mind travels along with body
Body can’t cope with mind's peace
There created a long huge space

Around sea
Murmuring divine chanting
Humans seeking lost blessing
Wind & waves buzzing the bell
No one can able to tell

Sizzling damp crystalline send
Force me enough  to bend
With diluting body into it
I said confidently "I got it"

Saturday, November 10, 2012

प्रियतमा



प्रिये तुम कितनी कोमल कितनी चंचल
आवाज़ तुम्हारी
कितनी सुरमई
देती मुझे प्रेरणा और हिम्मत हर पल

समीप रहती तुम सदैव मेरे मन के
छवि अमिट है तुम्हारी,
ह्रदय में मेरे
नहीं भूल सकता तुम्हे चाह कर के

वो क्षण, जब तुम रहती हो मेरे आसपास
सुंगंध तुम्हारे,
काले टेसुओं की
अविस्मृत कर देती मुझे तुम्हारी हर श्वास

प्रभावित होता हूँ मैं तुम्हारे व्यक्तित्व से
लगता हैं मानो
तुम हो साक्षात रति
आह्लादित होता मैं तुम्हारे  लावण्य से

अपनी मोहक मुद्राओं से मदांध करती
बल खाती तुम्हारे
कटी बंध की रेखाएं
श्यामवर्णी लटें बलखाती आँचल पर लहराती

नयनो में छलकता विराट प्रेमसागर
पानी जिसका
जैसे हो कोई मदिरा
पाया प्रेम रत्न मैंने इसमे डूबकर

अभिलाषा मेरी हैं केवल इतनी प्रिये
अमिट रहे छवि तुम्हारी
ह्रदय में
आती रहन स्वप्न में इसलिए

अंग्रेजी चिठ्ठे


Finding happiness in your life 

Excellent Articles

Wednesday, November 7, 2012

-:मदिरा :-


                     
 मदिरा वह द्रव है जो दवा होने का दवा करने के साथ साथ  सीधे अवचेतन याने Subconsciousness
पर आघात करती हैं | यह उस विश्व के होने का अति विश्वसनीय आभास देती हैं जो हमारे मस्तिष्क के रचनात्मक क्रियाशीलता का भाग नहीं होता ,इसी अवस्था को नशा या मद नाम से भी परिभाषित किया जा सकता हैं |  मदिरा पीने के पहले की स्थिति और फिर पीने के बाद की स्थितियों के अनुभवों को जैसा अनुभव किया उन्हें शब्दों के वस्त्रों में लपटने का प्रयास है यह कविता 


मद है जिसमे अटूट और जहरीला 
पीता इसको है फिर भी हटीला 
पीकर मनुष्य जिसको नहीं होता अकेला 
इस द्रव को कहते हम मदिरा 

दुःख ,पीड़ा को हरती और देती चैन 
पीकर इसको दमकते दोनों नैन 
व्यसनी मानते इसको अनमोल हीरा 
इस द्रव को हम कहते मदिरा  

जाम पे जाम पीते और छलकाते
मनुष्य अपनी बैचैनी भूल जाते 
लगता सरल पथ यदि हो पथरीला 
इस द्रव को हम कहते मदिरा   

अधरों की प्यास बुझती हैं 
कंठ को तर कर देती हैं
मस्तिष्क पर तो असर होता गहरा 
इस द्रव को हम कहते मदिरा  

प्रेमिका बन अधरों का चुम्बन लेती 
माता बन सिर को थपकाती
मित्र बन साथ हमारे लहराती 
इस द्रव को हम कहते मदिरा   

पीकर इसको बनता कोई दार्शनिक 
होता ये है मात्र  तात्क्षणिक 
उतरती है तो होता सब नाकारा
इस द्रव को हम कहते मदिरा  

Saturday, October 27, 2012

गज़ल गोई

गज़ल  मूलतः अरबी साहित्य की एक विधा थी..यह कसीदे का शुरुवाती भाग हुआ करता था | बाद में  इरानी फारसी साहित्य में  गज़ल को एक उन्नत और अपने आप में एक पूर्ण विधा का दर्जा मिला |
इसी उन्नत रूप में यह काव्य विधा खड़ीबोली में उर्दू गज़ल के रूप में परवान चढ़ी |
इस विधा के अपने कुछ उसूल और कायदे है...जो इसे कसावट भरा और गीतात्मक बनाते हैं | कहते हैं गज़ल कहना आसान भी है और मुश्किल भी ...बस प्रयास किया हैं
इश्क मेरा बेमौत क्योंकर मरे ऐ बेवफा
जियेगा ये कमबख्त लिए तेरे ऐ बेवफा 

सोती रातों को जगां हूँ मैं बेखुद होकर
तू रकीब  पर इनायत करे ऐ बेवफा

कु-ऐ-यार में रकीब को यार बना  बैठे हैं 
उम्मीद में कि इधर  नज़र फिरे ऐ बेवफा

बादा ओ जाम नशे में करने लगे हैं रक्स
मैखाने में यूँ  हर शख्स गिरे ऐ बेवफा

तेरी इक नज़र का क़ायल "रविन्द्र" बदनसीब
कि अब तलक हैं ज़ख्म-ऐ-इश्क हरे ऐ बेवफा 

Sunday, October 14, 2012

कलयुग

यह कविता करीब वर्ष भर पहले लिखी गई थी ,,परन्तु कुछ उथल पुथल समयातीत होती हैं


जीवन मूल्यों को चुनौती देता आया कलयुग 
मानव मन को कलुषित करता आया कलयुग 
फिर भी तस्वीरें उज्वल होती रहीं
मिटा न पाया इन्हें कलयुग


गुनाहों और पापों का ये कलयुग
मनुष्यों को अमनुष्य  बनाता ये कलयुग 
कुछ सज्जनों से हारता ये कलयुग
पल  पल लंबा होता ये कलयुग 

मूल्यों को गर्त में धकेलता हुआ कलयुग 
षडयंत्रों को रचता हुआ कलयुग 
सरल को कठिन बनाता हुआ कलयुग 
मोल पानी का  मांगता हुआ कलयुग 

किलकारियों को रुदन में बदलता कलयुग 
गीतों  को शोर में बदलता कलयुग
विद्वानों  को पथ से बहकता कलयुग 
अपनों को अपनो से परे ले जाता कलयुग 

रिश्तों  को ठुकराता कलयुग 
पांखंडियों को पुचकारता कलयुग 
चमत्कारों से बहलाता कल युग 
असत्य को स्वीकारता कल युग

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Thursday, October 11, 2012

नकली चेहरे

यह कविता  ७ अक्टूबर २००६  की रात को हैदराबाद में लिखी गई थी ...कुछ घटनाएँ याद आ गई थी ......

नकाब से ये नकली  चेहरे,
मानो बदलना इनका स्वभाव हैं
चाहे लाख लगाओ पहरे,
ये तो हैं बदलते चेहरे !

आडम्बरो से आच्छादित,
चालाकी से आनंदित 
कहते इनको कलयुगी चेहरे,
ये तो हैं बदलते चेहरे !

विश्वास  को पहुंचाते आघात,
करना होगा इनका प्रतिघात 
कुटिलता से भरे चितेरे,
ये तो हैं बदलते चेहरे !

पल में अपने  पल में पराये,
निज स्वार्थ सबकुछ कराये 
लालच ह्रदय  में भरे ,
ये तो हैं बदलते चेहरे !

विप्लव है अति आवश्यक,
परिवर्तन होगा तब्सर्थक 
आघात करो इन पर करारे,
ये तो हैं बदलते चेहरे !


Tuesday, October 2, 2012

पल पल बदलती परिस्थितयाँ

पुरानी डायरियों,नोटबुकों में कभी कभी कुछ ऐसी बहुमूल्य अनुभूतियाँ दिखाई दे जाती हैं कि उनका प्रासंगिक होना बहुत अच्छा लगता हैं ....प्रस्तुत हैं मेरी पुरानी नोटबुक मैं १३ अक्टूबर २००६ की एक अभिव्यक्ति

घटनाएँ  

घटनाएं अपनी गति से घटती हैं ,
पहचानो अपनी घटनाओं को 
जो उद्देश्य तक पहुचती हैं 
अन्य तो मात्र घटती हैं 

 नायक बनो उन घटनाओं का 
जो नया इतिहास रच सके 
सार्थक हैं केवल वे घटनाएं
जो आरम्भ करे नये आयामों का 

घटक, घटनाओ के  पहचानो
कमी क्या थी ढूंढ निकालो 
परिष्कृत संस्करण परिभाषित कर 
पुनःवे घटनाएं  घट डालो

प्रभाव हर घटना का होता भिन्न 
स्त्रोत हो सकता हैं एक उनका
रास्ते  घटने के होते हैं विभिन्न 
रखो खाता इनके हर पल का 

घटनाएँ पसंद करती हैं मूक दर्शक 
क्योंकि वे घटने देते हैं बे रोक टोक 
महापुरुष  ही मोड़ते  घटनाओं की दिशा 
इतिहास  बनाता इन्ही से रोमहर्षक

  "एक सच्चा मुसलमान " कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ में होती है जिस के लेखक बारे में कल तक आप को कुछ भी  कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ...