मुझे न जाने कितनी बार ही यह अनुभूति होती हैं कि खुशियों और समुद्री लहरों में आपस में कुछ समानताएँ होती हैं ,उदाहरणार्थ खुशियाँ भी लहरों के तरह उफनती हुई आती हैं और हमारे मन और मस्तिष्क को अपनी शीतल अनुभूतियों से सरोबर कर देती हैं ,आती हुई लहरे ज्यादा रोमांचित करती हैं बनिस्बत इसके कि जब लहर हमसे टकराए और हम उसकी तीव्रता कम होती हुई महसूस करें , खुशी भी जब आती हुई मालूम होती हैं तो ज्यादा अच्छा लगता हैं बनिस्बत खुशी को भोगते हुए इतना रोमाचं नहीं होता
उपरोक्त विचार मेरे मन में उमड़ घुमड़ के आ रहे थे जब भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिमी घाट पर उत्तर मध्य कोंकण पट्टी का भ्रमण कर रहा था | परशुराम की इस धरती पर पहाड़ ,समुद्र और मैदानों का अद्भुत मिश्रण नज़र आता हैं | एक तरफ आकाश का चुम्बन लेती सह्याद्री पर्वत की चोटियाँ तो दूसरी तरफ हिलोरे मारता अरब सागर और इन दोनों के बीच बसे हुए अनगिनत मंदिर और छोटे छोटे सुरम्य गाँव-कस्बे |
पहाडो के मध्य राजमार्ग सर्पीली आकृति में ढला हुआ एक रोमांचकारी अनुभूति देता हैं जिस पर सफर करना जीवन में लिए गए ऐसे निर्णयों के प्रतिबिंबित करता हैं जिनके परिणाम के बारे में हमें ज्यादा अंदाज़ा नहीं होता.
हरे भरे पेड़ जिनमे नारियल,हापुस और केले बहुतायत में है,तीनो पेड़ एक साथ हमारी भारतीय संस्कृति के तीन आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं | नारियल हमारी हजारो वर्ष पुरानी आध्यात्मिकता का, केले हमारी मानसिक सरलता और हापुस हमारी संस्कृति की उस शक्ति का प्रतीक हैं जो विभिन्न मतों और दर्शनों को
अपने आप में समाहित और पुनर्नियोजित कर लेती हैं |
कोंकण पट्टी के पूर्व में सह्याद्री है तो पश्चिम में अरब सागर ,ये दोनों परम भोगोलिक स्थितियां हैं जो मेरे लिए जीवन की भव्यता और तरलता का प्रतिनिधित्व करती हैं ,जीवन की भव्यता का तात्पर्य केवल भौतिक उन्नति की प्राप्ति नहीं हैं जीवन के भव्यता निहित हैं इसमें भोगे जाने वाले विभिन्न यथार्थों में, जैसे पहाड़ पर कही घने पेड़ है तो कही झाड़ झंखाड और कही तो नग्न चट्टानें , ये सभी मिलकर पहाड़ को पूर्ण भव्यता प्रदान करते हैं ,ठीक इसी प्रकार सुख-दुःख, सफलता-असफलता ,मान-अपमान आदि मिलकर जीवन को भव्यता प्रदान करते हैं |
ठीक इसी प्रकार अगर जीवन समुद्र की तरह तरल नहीं होगा यानी वो विभिन् स्थितयों में ढलने के योग्य नहीं होगा तो जीवन की यात्रा लगभग असंभव हैं
क्योंकि तरल ठोस की अपेक्षा ज्यादा तेज़ी से अपनी मंजिल तय करता हैं |
कोंकण के समुद्र तटों मंदिर होने से एक बात तो सुनिश्चित हो जाती है कि समुद्र तट "BEACH" नहीं बन पाते जो अच्छा भी और उदासी भरा भी....अच्छा इसलिए कि हरेक आदमी कूड़ा करकट
करने से पहले १० बार सोचता हैं और उदासी भरा इसलिए कि भई "Beach"वाला मज़ा न ले पाने के कारण अधूरापन महसूस होता हैं |
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