Tuesday, October 30, 2012

अंग्रेजी चिट्ठों से

Did I fly too high?
Sun blazes angrily
Wax weeps from my wings.......


वस्तुतः कविता न होकर एक प्रकार से सवेंदना स्वयं शब्द बनकर प्रस्तुत हैं 
http://followyourshadow.wordpress.com/

Saturday, October 27, 2012

गज़ल गोई

गज़ल  मूलतः अरबी साहित्य की एक विधा थी..यह कसीदे का शुरुवाती भाग हुआ करता था | बाद में  इरानी फारसी साहित्य में  गज़ल को एक उन्नत और अपने आप में एक पूर्ण विधा का दर्जा मिला |
इसी उन्नत रूप में यह काव्य विधा खड़ीबोली में उर्दू गज़ल के रूप में परवान चढ़ी |
इस विधा के अपने कुछ उसूल और कायदे है...जो इसे कसावट भरा और गीतात्मक बनाते हैं | कहते हैं गज़ल कहना आसान भी है और मुश्किल भी ...बस प्रयास किया हैं
इश्क मेरा बेमौत क्योंकर मरे ऐ बेवफा
जियेगा ये कमबख्त लिए तेरे ऐ बेवफा 

सोती रातों को जगां हूँ मैं बेखुद होकर
तू रकीब  पर इनायत करे ऐ बेवफा

कु-ऐ-यार में रकीब को यार बना  बैठे हैं 
उम्मीद में कि इधर  नज़र फिरे ऐ बेवफा

बादा ओ जाम नशे में करने लगे हैं रक्स
मैखाने में यूँ  हर शख्स गिरे ऐ बेवफा

तेरी इक नज़र का क़ायल "रविन्द्र" बदनसीब
कि अब तलक हैं ज़ख्म-ऐ-इश्क हरे ऐ बेवफा 

Sunday, October 14, 2012

कलयुग

यह कविता करीब वर्ष भर पहले लिखी गई थी ,,परन्तु कुछ उथल पुथल समयातीत होती हैं


जीवन मूल्यों को चुनौती देता आया कलयुग 
मानव मन को कलुषित करता आया कलयुग 
फिर भी तस्वीरें उज्वल होती रहीं
मिटा न पाया इन्हें कलयुग


गुनाहों और पापों का ये कलयुग
मनुष्यों को अमनुष्य  बनाता ये कलयुग 
कुछ सज्जनों से हारता ये कलयुग
पल  पल लंबा होता ये कलयुग 

मूल्यों को गर्त में धकेलता हुआ कलयुग 
षडयंत्रों को रचता हुआ कलयुग 
सरल को कठिन बनाता हुआ कलयुग 
मोल पानी का  मांगता हुआ कलयुग 

किलकारियों को रुदन में बदलता कलयुग 
गीतों  को शोर में बदलता कलयुग
विद्वानों  को पथ से बहकता कलयुग 
अपनों को अपनो से परे ले जाता कलयुग 

रिश्तों  को ठुकराता कलयुग 
पांखंडियों को पुचकारता कलयुग 
चमत्कारों से बहलाता कल युग 
असत्य को स्वीकारता कल युग

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Thursday, October 11, 2012

नकली चेहरे

यह कविता  ७ अक्टूबर २००६  की रात को हैदराबाद में लिखी गई थी ...कुछ घटनाएँ याद आ गई थी ......

नकाब से ये नकली  चेहरे,
मानो बदलना इनका स्वभाव हैं
चाहे लाख लगाओ पहरे,
ये तो हैं बदलते चेहरे !

आडम्बरो से आच्छादित,
चालाकी से आनंदित 
कहते इनको कलयुगी चेहरे,
ये तो हैं बदलते चेहरे !

विश्वास  को पहुंचाते आघात,
करना होगा इनका प्रतिघात 
कुटिलता से भरे चितेरे,
ये तो हैं बदलते चेहरे !

पल में अपने  पल में पराये,
निज स्वार्थ सबकुछ कराये 
लालच ह्रदय  में भरे ,
ये तो हैं बदलते चेहरे !

विप्लव है अति आवश्यक,
परिवर्तन होगा तब्सर्थक 
आघात करो इन पर करारे,
ये तो हैं बदलते चेहरे !


Tuesday, October 2, 2012

पल पल बदलती परिस्थितयाँ

पुरानी डायरियों,नोटबुकों में कभी कभी कुछ ऐसी बहुमूल्य अनुभूतियाँ दिखाई दे जाती हैं कि उनका प्रासंगिक होना बहुत अच्छा लगता हैं ....प्रस्तुत हैं मेरी पुरानी नोटबुक मैं १३ अक्टूबर २००६ की एक अभिव्यक्ति

घटनाएँ  

घटनाएं अपनी गति से घटती हैं ,
पहचानो अपनी घटनाओं को 
जो उद्देश्य तक पहुचती हैं 
अन्य तो मात्र घटती हैं 

 नायक बनो उन घटनाओं का 
जो नया इतिहास रच सके 
सार्थक हैं केवल वे घटनाएं
जो आरम्भ करे नये आयामों का 

घटक, घटनाओ के  पहचानो
कमी क्या थी ढूंढ निकालो 
परिष्कृत संस्करण परिभाषित कर 
पुनःवे घटनाएं  घट डालो

प्रभाव हर घटना का होता भिन्न 
स्त्रोत हो सकता हैं एक उनका
रास्ते  घटने के होते हैं विभिन्न 
रखो खाता इनके हर पल का 

घटनाएँ पसंद करती हैं मूक दर्शक 
क्योंकि वे घटने देते हैं बे रोक टोक 
महापुरुष  ही मोड़ते  घटनाओं की दिशा 
इतिहास  बनाता इन्ही से रोमहर्षक

  "एक सच्चा मुसलमान " कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ में होती है जिस के लेखक बारे में कल तक आप को कुछ भी  कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ...