Monday, December 2, 2024


 "एक सच्चा मुसलमान "


कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ में होती है जिस के लेखक बारे में कल तक आप को कुछ भी कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ में होती है जिस के लेखक बारे में कल तक आप को कुछ भी नहीं मालूम था न ही उपन्यास के बारे में। इस उपन्यास का पढ़ा जाना अपने आप में इसलिए भी एक सरप्राइज़ रहा क्यों कि हाल में ही पड़ोसी देश में हुई राजनीतिक उठापठक ने जो एक नया राजनीतिक परिदृश्य उपस्थित कर दिया है उस की पृष्ठभूमि का कुछ प्रतिबिंब इस उपन्यास के कथानक में देखा जा सकता है। इस तरह की कोई भी घटना स्वतः स्फूर्त इतनी नहीं होती जितनी कि इसके पीछे एक सामूहिक राजनैतिक-सामाजिक चेतना विभिन्न स्तरों पर सरगर्म होती है और जिस की विकास धारा इतिहास और समकाल की विभिन्न परतों से न बनी हों। यह उपन्यास 2013 में प्रकाशित हुआ था जो तहमीमा के पहले उपन्यास The Golden Age की कहानी का दूसरा भाग है। उपन्यास में वर्तमान 80 के दशक के मध्य में स्थित है जिसका एक अंश निकट भूतकाल में समाहित है जो 70 के दशक में युद्ध के पश्चात के चंद वर्षों से अपना संबंध जोड़े हुए है.

 

 

उपन्यास के मुख्य चरित्र माया में बांग्लादेश के प्रगतिवादी बौद्धिक मानस की विडंबनाओं, दुःस्वप्नों की चिंताओं का एक हिस्सा मिल जाता है जो बांग्लादेश बनने के बाद तेजी बदलते हालात और मोहभंग की स्थिति से उपजती प्रतिक्रिया के प्रति अपनी स्थिति को समझने की कोशिश है। युद्ध के बाद के वर्षों में माया 7 बरस तक घर से दूर रही। वह डाक्टर है और इन वर्षों में दूर दराज के इलाकों में नए बांग्लादेश की युद्ध से उबर रही जनता की सेवा में उसने काम किया है । जहां बड़े पैमाने पर बलात्कार का शिकार हुई महिलाओं की मानसिक और मनोवैज्ञानिक त्रासद यादों से उबारने में मदद करना , पुनर्वास इत्यादि चुनौती भरे काम शामिल थे। अपने अनुभवों में माया को बहुत विश्वास है जो उसे यह महसूस कराने में सक्षम होते हैं कि उसके व्यक्तित्व में नए आशावाद की मजबूत इच्छा शक्ति भरी हुई है जिसके सहारे वह जब वह वापस लौट कर फिर से नई शुरुआत कर सकती है उसका भाई सुहैल युद्ध के दिनों में विद्रोही सेना में शामिल था। युद्ध में हुई भीषण त्रासदी को उसने बहुत करीब से देखा है जिस के चलते वह एक मानसिक यंत्रणा से गुज़र रहा है और युद्ध के बाद शेख मुजीब की हत्या और तानाशाही ने उसे धीरे धीरे भविष्य के बांग्लादेश के प्रति उदासीन और निराशा से भर दिया है । इसके चलते एक समय का प्रगतिवादी आधुनिक क्रांतिकारी युवा धीरे धीरे धार्मिक रूढ़िवाद में पनाह तलाशता है । सुहैल का चरित्र पूरी तरह से माया के कथोपकथन पर निर्भर होने के कारण उपन्यास में बहुत दबा हुआ और अविकसित सा महसूस होता है। ऐसा लगता है की उपन्यास लेखिका ने माया के अस्तित्ववादी और राजनैतिक चिंतन को उभारने के लिये ही सुहैल का प्रतिकृति नुमा अक्स फकत एक सहारे के लिए ही खड़ा किया है पूरा उपन्यास बहन माया और भाई सुहैल के बीच चलने वाली मानसिक खींचतान और विचारों के टकराव की विशद समीक्षा है। माया जहां आशावान है कि जिस तरह हम एक तरह की तानाशाही के खिलाफ लड़े थे वैसे ही हम पुनः दूसरी तरफ की तानाशाही से लड़ रहे हैं और इसमें भी सफल होंगे।


 

अपने ही घर के ऊपरी हिस्से में बने और सुहैल द्वारा चलाए जा रहे जमात ए इस्लामी के स्थानीय केंद्र में रोज होने वाली विभिन्न हलचलों और सुहैल के दिए जाने वाले भाषणों को माया सुनती, देखती और समझती है और उसका असर अपने चारों और महसूस करती है। उसका पूरा परिवार प्रगतिवादी हुआ करता था और मानसिक रूप से आधुनिक सामाजिक-राजनीति बोध की और झुकाव रखता था उसके पिता युद्ध में मारे गए थे और माँ ने भी मजबूती से संघर्ष के दिनों में परिवार को संभाला हुआ था । माँ रेहाना केन्सर से जूझ रही है और बेटे सोहेल की बदलती हुई मानसिक स्थिति को कुछ दिनों के लिए अपनाई गई एक दवा, एक पलायन के रूप में स्वीकार करती है उसे लगता है कि युद्ध के बाद अगर वह अपने अंदर चेतना में पैदा हुई त्रासदी से उभरने के लिए धर्म का सहारा ले रहा है तो इसमें कुछ गलत नहीं है । माया की समस्या यह है कि वह जो घर में हो रहा है उसे बांग्लादेश में राष्ट्रीय सतह पर होने वाले परिवर्तनों के बड़े परिदृश्य में भी देख पा रही है।

 

माया और सुहैल के मध्य चलने वाले इस मानसिक और वैचारिक संघर्ष का एक हिस्सा सोहेल के पुत्र ज़ैद को लेकर है। ज़ैद जो सात आठ बरस का । ज़ैद एक ऐसा बच्चा है जो जिस पर सात बरसों में सुहैल ने कोई ध्यान नहीं दिया है। उसे बांग्ला पढ़ना नहीं आती और केवल अरबी के अक्षर पहचानता है। अस्त व्यस्त, लापरवाह  हुलिये में ज़ैद पहले तो माया की तरस और खीज  का कारण बनाता है फिर प्रेम का। वह माया के पर्स से पैसे चुरा लिया करता है जिसे माया माफ कर देती है और उसे खुद ही अपने परिवार के आधुनिक परिवेश में सुसभ्य और शिक्षित करने का फैसला करती है जो सोहेल को पसंद नहीं आता। वह उसे किसी दूरदराज के मदरसे में पढ़ने के लिए भेज देता है।

 

माया ने 7 बरस पहले घर छोड़ा था उसकी पृष्ठभूमि में भी सुहैल और माया के बीच यही संघर्ष था। जब सुहैल धीरे धीरे रूढ़िवाद की और झुक रहा था और माया उसका तीखा प्रतिरोध कर रही थी। एक दिन जब सुहैल घर में रखी अंग्रेजी, बांग्ला साहित्य, पश्चिमी दर्शन की सभी किताबें जला रहा होता है तब माया का धैर्य जवाब दे जाता है वह घर छोड़ कर चली जाती है। यह घटना और प्रसंग उपन्यास में बहुत ही कलात्मक ढंग से व्यक्त हुआ है । जब किताबें जलाने का फैसला हो चुका है तब एक आखिरी नाटकीय कोशिश के रूप में माया एक अभिनव प्रयास करती है जिसमें टैगोर की कविताओं का हारमोनियम पर ऊंची आवाजों में पाठ, बांग्ला क्रांति के वर्षों में गाए जाने वाला गीत और नजरुल इस्लाम की कविताएं भी लेकिन सुहैल पर माया के इस प्रयास का कोई फर्क नहीं पड़ता और किताबें जला दी जाती हैं। 1984 में जब वह वापस लौटती है तब उसका संघर्ष ज़ैद को लेकर है जो बांग्लादेश की नई आने वाली नस्ल के एक धुंधले भविष्य के प्रतीक के रूप में उभरता है। जब माया और सुहैल की माँ रेहाना अस्पताल में कैंसर  से जूझ रही होती है उसी दरम्यान ज़ैद मदरसे से भागकर घर वापस लौट आता है और मदरसे में हुए यौन शोषण की बात माया को बताता है। माँ की तीमारदारी में व्यस्त माया इस पर ध्यान नहीं देती और इसी बीच सुहैल अपने बेटे ज़ैद को पुनः वापस मदरसे भेज देता है। इसी बीच माया को लगता है कि इसमें सच्चाई भी हो सकती है। वह सुहैल को बताती है की वह इस बात की तह तक जाए लेकिन सुहैल के ठंडे रवैये से आहत माया स्वयं ही ज़ैद को वापस लाने की ठान लेती है। इस कोशिश में ज़ैद की मृत्यु नदी में डूबने से हो जाती है। मदरसे से एक बच्चे को छुड़ाने के प्रयास से बेवजह एक राजनैतिक विवाद खड़ा हो जाता है जिस के चलते माया को जेल होती है लेकिन वह जल्द ही रिहा हो जाती है उपन्यास का अंत 1992 के उपसंहार से होता है जहां वह एक समारोह में अपनी पाँच वर्षीय बेटी के साथ उपस्थित होती है जहां क्रांति के दिनों के गद्दारों पर फिर से मुकदमा चलाने का ऐलान होता है और उन महिलाओं का सम्मान हो रहा होता है जिन्होंने युद्ध की क्रूरता अपने शरीरों पर झेली होती है और अब वे समाज में सम्माननीय मानी जाती हैं।

 

तहमीमा अनम बांग्लादेश के उस परिवार से संबंध रखती है जो तीन पीढ़ियों से बांग्लादेश के सामाजिक और बौद्धिक अभिजात वर्ग का हिस्सा रहा है। उपन्यास चूंकि अनुवाद है इसलिए इसकी अपनी सीमाएं हैं परंतु अनुवादक ने उपन्यास की भाषा को दुर्बोध्य और बेमेल नहीं होने दिया है जैसे अधिकांश हिन्दी में अनूदित उपन्यासों में आमतौर से देखने में आता है । उपन्यास पढ़ें के बाद मुझे उपन्यास का शीर्षक उपन्यास की आत्मा से बेमेल सा लगा और उस पर छपी तस्वीर भी । शायद यह टोटका पुस्तक के संपादक या प्रकाशक द्वारा उस मतिभ्रम को आकर्षित करने के उपाय के रूप में किया गया है जहां मुस्लिम समाज की स्टीरियोटाइप छवि को लेकर एकसाथ व्यक्त होते आकर्षण और शंकाएं समाज के संकीर्ण और औसत मानसिकता रखने वाले हिस्से में आम तौर से उपस्थित होती हैं।  

 

 

  

  "एक सच्चा मुसलमान " कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ में होती है जिस के लेखक बारे में कल तक आप को कुछ भी  कभी बस यूँ ही कोई किताब हाथ...